तुमसे दूर होकर भी
तुमसे दूर हुआ हूँ लेकिन,
तुमसे दूर नहीं हो पाया,
जितना तुमको भूलना चाहा,
उतना ही तुमको मन में पाया।
वक्त बहुत आगे बढ़ आया,
मौसम कितने बदल गए,
लेकिन मन के उस आँगन में
हम अब भी वहीं ठहर गए।
कितनी बातें थीं कहने को,
कितने सपने अधूरे थे,
कुछ पल तेरे साथ बिताए,
शायद वही तो पूरे थे।
तेरी आँखों की वह गहराई
आज भी मन पढ़ लेता है,
बिन बोले ही मेरा मन
तेरा हर उत्तर सुन लेता है।
कभी-कभी यूँ लगता है जैसे
तुम आवाज़ लगाती हो,
मैं मुड़कर देखूँ तो पाता—
तुम स्मृति बन मुस्काती हो।
मन कहता है लौट चलूँ फिर
उन बीते दिनों की ओर,
जहाँ प्रेम सरल-सा लगता था,
और तुम थीं मेरी भोर।
पर जीवन की राहें अक्सर
मन की राह कहाँ होती हैं,
कुछ चाहतें पूरी होकर भी
पूरी कहाँ होती हैं।
तुम मेरी चाहत थीं शायद,
या कोई अधूरा सपना,
जिसे आँखों ने खोया लेकिन
दिल ने माना नहीं अपना।
अब तुम जहाँ भी हो, खुश रहना—
बस इतनी-सी दुआ मेरी,
तुम्हारे हिस्से धूप न आए,
मिलती रहे सदा सवेरी।
और अगर कभी मेरी याद
चुपके से मन में आए,
तो समझ लेना—दूर कहीं कोई
अब भी तुम्हें मुस्कुराकर चाहे।
क्योंकि प्रेम समाप्त नहीं होता
साथ छूट जाने से,
कभी-कभी वह और गहरा होता है
बस… कह न पाने से।
- अनिता चतुर्वेदी 'मनस्वरा'