विज्ञापन

ओह! प्रकृति की यह चित्रशाला,

Anita Chaturvedi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            संध्या-सुंदरी : सागर के तट पर
        
                                                    
                            

नील गगन के कोमल आँचल में,
किसने रंग गुलाल भरा?
संध्या की अलसाई पलकों पर,
किसने स्वर्णिम स्वप्न धरा?

सागर की लहरों के उर पर,
रवि की अंतिम रश्मि सोई,
गुलाबी नभ की मृदु आभा में,
धरा रंगों में नहाई।

बैंगनी बादल की छाया में,
अरुणिम आभा मुस्काती है,
लहरों की रजतिम रेखाओं पर,
किरणें मोती बरसाती हैं।

धीरे-धीरे तट को छूकर,
लहरें लौट चलीं अनजानी,
रेतिल तट पर बैठी धरती,
सुनती सागर की अमर कहानी।

नभ की नीरवता में जैसे,
कोई मधुरिम गीत पला है,
सूरज का स्वर्णिम बिंब समेटे,
सागर का आँचल दमका है।

ओह! प्रकृति की यह चित्रशाला,
कितनी अनुपम, कितनी प्यारी,
एक ओर दिन का मौन विसर्जन,
एक ओर निशि की तैयारी।

क्षणभंगुर इस रूप-सुधा में,
चिर सौंदर्य का वास मिला,
ढलते रवि की अंतिम किरणों में,
जीवन का मधुमास मिला।
— अनिता चतुर्वेदी
एक दिन पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Dn Chaubey

7573 कविताएं

View Profile