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मौलसिरी

Anita Chaturvedi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मौलसिरी
        
                                                    
                            

रात के तीसरे पहर
जब शहर की सारी आवाज़ें
अपने-अपने घर लौट जाती हैं,
तब चुपचाप महकती है
मौलसिरी।

न कोई शोर,
न कोई घोषणा—
बस हवा की हथेली पर
रख देती है
अपनी थोड़ी-सी सुगंध।

कभी सोचा है,
कुछ लोग भी तो
मौलसिरी जैसे होते हैं—

दिखते कम हैं,
महकते अधिक हैं;
अपने होने का
ढिंढोरा नहीं पीटते,
बस किसी उदास शाम में
अचानक याद आ जाते हैं।

मौलसिरी के फूल
रात में खिलते हैं,
शायद इसलिए
कि उन्हें पता है—
हर सुंदर चीज़ को
रोशनी की गवाही
ज़रूरी नहीं होती।

वे झरते हैं
तो लगता है
जैसे किसी ने
धरती पर
स्मृतियों की सफ़ेद चिट्ठियाँ
बिखेर दी हों।

मैंने एक फूल उठाया—
हथेली पर रखा
तो एक पुरानी शाम
फिर से जीवित हो गई।

तुम्हारी आवाज़,
वह अधूरी बातचीत,
वह लौटकर न आने वाला समय—
सब कुछ
उस छोटी-सी खुशबू में
कैद था।

तभी समझी—
मौलसिरी केवल फूल नहीं,
वह स्मृति है;
जो बीत जाने के बाद भी
मन के किसी कोने में
चुपचाप खिलती रहती है।

और शायद प्रेम भी
ऐसा ही होता है—
व्यक्ति चला जाता है,
समय बदल जाता है,
मगर उसकी खुशबू
किसी मौलसिरी की तरह
रात के गहरे सन्नाटे में
फिर-फिर लौट आती है।

-अनिता चतुर्वेदी
एक महीने पहले
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