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झरे फूलों की स्मृतियाॅं

Anita Chaturvedi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            झरे फूलों की स्मृतियाॅं~
        
                                                    
                            

सुबह ने जब खोल दी
धूप की पहली खिड़की,
आँगन में चुपचाप झरे
हरसिंगार के फूल।

उनकी भीनी-सी सुगंधी में
कुछ बीते मौसम जागे,
और मन की तह में दबे
कितने ही अनकहे संवाद
धीरे-धीरे आँखों तक आ गए।

वही पुरानी पगडंडी थी,
वही मोड़, वही रास्ता,
बस साथ चलने वाला कोई नहीं था—
फिर भी कदमों को
तेरा होना याद था।

हवा ने पूछा—
“किस बात का इतना इंतज़ार है?”

मैं मुस्कुरा दी—
“कुछ रिश्तों पर
किसी का अधिकार नहीं होता,
वे बस मन में उतरते हैं
और उम्र भर
मन के भीतर रहते हैं।”

झरती पंखुड़ियाॅं
आज भी सिखाती हैं—
खूबसूरती का अर्थ
सदा ठहर जाना नहीं,
कभी-कभी बिखरकर भी
पूरा हो जाना है।

जो मिला, वह सुखद था,
जो छूटा, वह भी अपना था,
शिकायत फिर किससे करती—
समय तो केवल
अपना रास्ता चुनता है।

अब न कोई प्रश्न बाकी है,
न कोई उत्तर माँगना है,
बस उन झरे फूलों की तरह
कुछ स्मृतियों को
हथेली पर रखकर
चुपचाप मुस्कुराना है।

क्योंकि—

हर कहानी का अंत
मिलन नहीं होता,
कुछ कहानियाँ
बिछड़कर भी
मन में महकती रहती हैं…

और शायद
यही प्रेम का
सबसे सुंदर रंग है। 
- अनिता चतुर्वेदी 'मनस्वरा'
7 घंटे पहले
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