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जब हो छोटा-सा उटज मेरा

Anita Chaturvedi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            महलों की ऊँची दीवारों से,
        
                                                    
                            
मुझको क्या लेना-देना,
मन को अपना सुख मिलता है,
जब हो छोटा-सा उटज मेरा।

तिनका-तिनका जोड़ बनाया,
छप्पर पर सपनों की छाया,
मिट्टी की सौंधी खुशबू में,
जीवन ने अपनापन पाया।

आँधी आई, दीप डगमगाया,
वर्षा ने आँगन भरमाया,
फिर भी हँसता रहा उटज,
उसने हार कभी न माना।

नहीं यहाँ रत्नों की चमक,
नहीं सोने का कोई साज,
दो रोटी, थोड़ा-सा स्नेह,
बस इतना ही जीवन का राज।

जिस उटज में प्रेम बसे हो,
वही महल कहलाता है,
ईंटों से घर नहीं बनता,
मन से घर बन जाता है।

राजमहल भी फीका पड़ता,
जब अपनापन खो जाता है,
टूटी-सी उस पर्णकुटी में
ईश्वर मुस्कुराता है।

उटज भले ही छोटा हो,
पर सपनों का आकाश बड़ा—
जिस घर में प्रेम का दीप जले,
वही संसार सबसे खरा।
- अनिता चतुर्वेदी 'मनस्वरा'
 
एक महीने पहले
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