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बहुत जी चुके हम तुम्हारी ख्वाहिश में,

Anila Virnave

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मनाते मनाते तुम्हे थक गए हैं हम,
        
                                                    
                            
अब मानने का मन नहीं करता ।

फेर ली है तुमने जो नज़रे तुम्हारी,
तो हमारा भी अब मिलाने का मन नहीं करता।

टूट गए है तेरे सितम से इतने ए बेरहम,
अब ज़ख़्म फिर हरा करने का मन नहीं करता ।

वफ़ा की थी हमने तो शिद्दत से लेकिन,
अब इक बेवफा पे मरने का मन नहीं करता।

बहुत जी चुके हम तुम्हारी ख्वाहिश में,
अब इस बेरुखी पे मरने का मन नहीं करता ।
-अनिला विर्णवे
एक दिन पहले
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