आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

बहुत जी चुके हम तुम्हारी ख्वाहिश में,

                
                                                         
                            मनाते मनाते तुम्हे थक गए हैं हम,
                                                                 
                            
अब मानने का मन नहीं करता ।

फेर ली है तुमने जो नज़रे तुम्हारी,
तो हमारा भी अब मिलाने का मन नहीं करता।

टूट गए है तेरे सितम से इतने ए बेरहम,
अब ज़ख़्म फिर हरा करने का मन नहीं करता ।

वफ़ा की थी हमने तो शिद्दत से लेकिन,
अब इक बेवफा पे मरने का मन नहीं करता।

बहुत जी चुके हम तुम्हारी ख्वाहिश में,
अब इस बेरुखी पे मरने का मन नहीं करता ।
-अनिला विर्णवे
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
8 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर