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क्या लुटाते हो

Anil Pandey

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            क्या लुटाते हो बड़ी भीड़ चली आती है
        
                                                    
                            
इतनी दीवानगी यूं ही तो नहीं आती है
इतनी शिद्दत से वो नजरें चुराता है मुझसे
बात दबने की जगह और फ़ैल जाती है
बारिशों में तेरे ज़ुल्फ़ों से निकली लट कोई
हमने देखा कई मोती गिराए जाती है
हालत चमन की पहले भी बहुत ठीक न थी
बारिशें दरख्तों पर ही बिजलियां गिराती हैं
उसने लबों से चाहे न कुछ कहा हो कभी
उसकी झुकती सी निगाहें मुझे बुलाती हैं
तुझसा नादान यहां कोई तो नहीं होता है
सोच समझ कर हर शै फैसला उठाती है
उठ गया मेला, कितने दिलफरेब खेल दिखा
तू भी जा घर को, देख भीड़ चली जाती है
एक महीने पहले
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