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क्या लुटाते हो

                
                                                         
                            क्या लुटाते हो बड़ी भीड़ चली आती है
                                                                 
                            
इतनी दीवानगी यूं ही तो नहीं आती है
इतनी शिद्दत से वो नजरें चुराता है मुझसे
बात दबने की जगह और फ़ैल जाती है
बारिशों में तेरे ज़ुल्फ़ों से निकली लट कोई
हमने देखा कई मोती गिराए जाती है
हालत चमन की पहले भी बहुत ठीक न थी
बारिशें दरख्तों पर ही बिजलियां गिराती हैं
उसने लबों से चाहे न कुछ कहा हो कभी
उसकी झुकती सी निगाहें मुझे बुलाती हैं
तुझसा नादान यहां कोई तो नहीं होता है
सोच समझ कर हर शै फैसला उठाती है
उठ गया मेला, कितने दिलफरेब खेल दिखा
तू भी जा घर को, देख भीड़ चली जाती है
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एक घंटा पहले

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