हासिल थी वो जुदाई,किस्से थे वस्ल के
दिल आता रहा, हाथों में सीने से निकल के
बंजारे हैं कुछ देर को यह भूल गए थे
दिखने लगे थे सपने भी घर के महल के
वो देख रहा गौर से अब खुदकुशी की राह
कुछ ढूंठ रह गए हैं,निशान फसल के
वरना हम सारे वाकयात यूं तो भूल गए थे
कुछ जख्म निकल आए हैं बीते हुए कल के
अंदाज तेरे इस तरह भी मशहूर हो गए
दिखते हैं कई लोग अब तेरी ही नकल के
सदमे में सभी फूल नहीं कुछ खिले खिले
कोई गुजर गया, हसीं कली को कुचल के
जाता रहा भरोसा,खुद से भी क्या कहें
गिरने के बाद फिर से चल रहे हैं सम्हल के