आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

बीते हुए कल के

                
                                                         
                            हासिल थी वो जुदाई,किस्से थे वस्ल के
                                                                 
                            
दिल आता रहा, हाथों में सीने से निकल के
बंजारे हैं कुछ देर को यह भूल गए थे
दिखने लगे थे सपने भी घर के महल के
वो देख रहा गौर से अब खुदकुशी की राह
कुछ ढूंठ रह गए हैं,निशान फसल के
वरना हम सारे वाकयात यूं तो भूल गए थे
कुछ जख्म निकल आए हैं बीते हुए कल के
अंदाज तेरे इस तरह भी मशहूर हो गए
दिखते हैं कई लोग अब तेरी ही नकल के
सदमे में सभी फूल नहीं कुछ खिले खिले
कोई गुजर गया, हसीं कली को कुचल के
जाता रहा भरोसा,खुद से भी क्या कहें
गिरने के बाद फिर से चल रहे हैं सम्हल के
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
4 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर