कुछ भी नहीं था इश्क में गफलत के सिवा और
हर दिल में मिला कुछ नहीं चाहत के सिवा और
झूठे ख्याल, झूठी बातें, झूठे अफसाने
था आशिकी में क्या इसी आदत के सिवा और
थी चार दिन की चांदनी,जल बुझ रहे चिराग
है देखने लायक भी क्या कुदरत के सिवा और
जाते हैं बदल साथ वक्त के सभी अहसास
सब कुछ तो है इस दुनिया में उल्फ़त के सिवा और
होते हैं अमल जमीं पे आसमां के इशारे
हासिल क्या हमें नाकाफी, कुव्वत के सिवा और
दुनिया है यह फिजूल की, ये दुनिया के हैं फिजूल
इंशान को क्या भी चाहिए इंसानियत के सिवा और
जब रुखसती हो दिल पे न रह जाए कोई बोझ
बाकी नहीं कुछ दिल में इस हसरत के सिवा और