आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

सब कुछ तो है इस दुनिया में उल्फ़त के सिवा और

                
                                                         
                            कुछ भी नहीं था इश्क में गफलत के सिवा और
                                                                 
                            
हर दिल में मिला कुछ नहीं चाहत के सिवा और
झूठे ख्याल, झूठी बातें, झूठे अफसाने
था आशिकी में क्या इसी आदत के सिवा और
थी चार दिन की चांदनी,जल बुझ रहे चिराग
है देखने लायक भी क्या कुदरत के सिवा और
जाते हैं बदल साथ वक्त के सभी अहसास
सब कुछ तो है इस दुनिया में उल्फ़त के सिवा और
होते हैं अमल जमीं पे आसमां के इशारे
हासिल क्या हमें नाकाफी, कुव्वत के सिवा और
दुनिया है यह फिजूल की, ये दुनिया के हैं फिजूल
इंशान को क्या भी चाहिए इंसानियत के सिवा और
जब रुखसती हो दिल पे न रह जाए कोई बोझ
बाकी नहीं कुछ दिल में इस हसरत के सिवा और
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 hours ago

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर