सीता राम की कथा अमर है, सबके ह्रदय में है राम विराज,
राम धर्म और न्याय के पालक, सिया की कहानी सुन लो आज !
धरती के गोद से खिली वोह कली, जनक के घर पलकों पे पली,
शिव धनुष का गुरूर मैथिली , राम के संग वोह अवध चली !
विवश दशरथ ने दिया वरदान, लखन सदा रहे भ्रात के दास,
जानकी पति बिन रहे न अवध में, राम के संग वो चली वनवास !
चित्रकूट से पहुंचे पंचवटी, अद्भुत मृग अति सुन्दर वन,
सीता भ्रमित उस माया जाल से , निकट टहल रहे राक्षस जन !
एक असुर कन्या हुई राम पर मोहित, संभल न सके लखन अपना क्रोध,
बदले के ताप में जलती शूर्पणका, अपने भ्रात से करे अनुरोध !
स्वर्ण हिरण से सिया आकर्षित, राम निकल पड़े वन के पार,
विचलित लक्ष्मण चले भाई के खोज में, एक भिक्षुक पहुंचा सिया के द्वार !
दुविधा में पड़ गयी मैथिली, भिक्षुक कहे लगी भूख और प्यास,
लखन के संकोच का करे उपेक्षा, रेखा पार चली भिक्षुक के पास !
भिक्षुक था मायावी राजा, गगन में प्रकट पुष्पक विमान,
सिया को उठाके ले गया रावण, जटायु रोके उसका उड़ान !
अशोक वन में सिया थी बंधित, राक्षस निरीक्षण प्रत्येक पहर,
दशानन रावण लंका का राजा, स्वर्ग से सुन्दर लंका नगर !
हर पल करे वो राम की प्रतीक्षा, बीत गए कई दिन और रैन,
प्रेम का पथ सदा ही कठिन है, अश्रु से भरे वो कोमल नैन !
जानकी कोसे अपने भाग्य को , भारी पड़ गया स्वर्ण हिरण ,
पवन पुत्र हनुमान का आगमन, मन में जागी आशा की किरण !
रावण मृत भीषण युद्ध में, विजयी राम ने लिखा इतिहास,
सपने समेटे चली बावरी, हर्षित सीता पति के पास !
विधि का खेल है अति विपरीत, जानकी तोहरा नियति कठोर ,
राम ने माँगा अग्नि परीक्षा , चाँद के ह्रदय को तोड़े चकोर !
पराय पुरुष ने किया अपहरण ,एक स्त्री के साथ हुआ दुर्व्यवहार,
पति अब मांगे शील परीक्षा, दोनों पक्ष से हुआ नारी का हार !
पर सिया के मन में बसे राम है, राम के नाम हर पल करे जाप,
रूठ न पायी वो रामचंद्र से, कैसी दुविधा कैसा ये श्राप !
अवध के राजा बने रामचंद्र , प्रजा के हित करे सिया का त्याग,
गर्भिणी सीता को भेजे वन में, कष्ट और दुःख लिखे उसके भाग !
एक दिन लव कुश पूछे मात से, अवध के राजा राम महान,
बार बार क्यों सिया से मांगे, उनकी पावनता का प्रमाण !
राम का जीवन प्रजा को अर्पित, राम निभा रहे राजा का कर्म ,
समझा रही सिया अपने पुत्र को, स्त्री की सुरक्षा समाज का धर्म !
लव कुश ने पिता को ललकारा, राम पधारे सिया के द्वार,
अश्रु रुके नहीं सिया के सामने, पुत्र को देख भर आया प्यार !
पर परीक्षा के बोझ तले दबी मैथिली, पृथ्वी के गोद में लौट चली,
फूल से नाज़ुक जनक लाड़ली, संसार के चलन से रूठ चली !
राम का प्रेम में सिया सदा जोगन , हर पल लब पर एक था नाम,
देश में हो परदेस में बैठे, हम भी जपते जय श्री राम !
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