क्या करना है क्या धरना है
सबको ही एक दिन मरना है,
फिर क्यों छीने किसी की रोटी
मेहनत से जो मिले तमाम ।
जुटा रहे हैं हम भी वैभव
चाहे तन ढाका हो हाफ,
दुःख सहकर हम मर जाएंगे
न जिए जिंदगी सुखी तमाम ।
शोषित का भी शोषण करते
हम जग में पागल से फिरते,
हम गरीब मजदूरों का भी
खून चूसते आठों याम ।
जीवन यूं ही गवाया हमने
चलते रहे भेड़ सी चाल,
पागल मानव हुआ सहोदर
क्यों पीता है झूठा जाम ।
- आनन्द गुर्जर सहोदर