योगी और महायोगी से
बढ़कर भी मानव है जग में,
उनके गुण में कैसे गाऊं
वह तो है गागर में सागर ।
द्वन्दों की झाड़ी से हटकर
विचर रहे हैं वह भी जग में,
नहीं कहीं पर ठौर ठिकाना
चल देते हैं फोड़ के गागर ।
कवि भिखारी कवि सिपाही
नेता अफसर बन जाते हैं,
लटका कर कंधों पर चीथड़े
हो जाते सभी के लायक ।
नायक और कभी खलनायक
कभी नालायक बन जाते हैं,
जग में हीरो एक अकेला
लगता है मुझको तो पागल ।
-आनन्द गुर्जर सहोदर