बचपन में लगता है सबको काश
जल्दी - जल्दी बड़े हो जाए ।
बड़े होने पर लगने लगता है , सिर्फ और सिर्फ
हमेशा सबसे बड़े बुजुर्गों की चलती है
बुद्धों को लगता है अब उनकी कौन सुनता है
ये तो हुई इंसानों की बात
करूं जो बात मौसम की तो उसमें भी
अरे ये बारिश कब जाएगी कब ठंडी आएगी
ठंड से ठिठुरने लगे तो भी कहा अरे ये ठंड तो
जाने का नाम ही नहीं ले रही
तौबा - तौबा गर्मी तो प्राण ले लेती है
उससे अच्छी तो बारिश या ठंड ही होती है
अब भला क्या भला है कौन बताए
तो फिर समझे कि नाही
लगती भली वो चीज जो न हो करीब ।