कोई अपना छूट रहा था दुनिया की भीड़ में
उसके लिए रुक गए , दुनिया को आगे बढ़ने दिया
ये नहीं कि , ग़म न हुआ हर दर्द चुपचाप सह लिया
इल्ज़ाम दें भी तो भला किसको दे
खुद स्वीकारा था हमने अब किस से गिला करें
हुनर कहो कि कुर्बानी सोच है तुम्हारी !!