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हुनर कहो कि कुर्बानी सोच है तुम्हारी

                
                                                         
                            कोई अपना छूट रहा था दुनिया की भीड़ में
                                                                 
                            
उसके लिए रुक गए , दुनिया को आगे बढ़ने दिया
ये नहीं कि , ग़म न हुआ हर दर्द चुपचाप सह लिया
इल्ज़ाम दें भी तो भला किसको दे
खुद स्वीकारा था हमने अब किस से गिला करें
हुनर कहो कि कुर्बानी सोच है तुम्हारी !!
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7 महीने पहले

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