हम सब तो कठपुतलियां हैं
हमारी डोर तो हमारे रचनाकार
अर्थात विधाता के हाथों में है
अच्छे कर्म करने की छूट दी गई है हमें
हमारे इन्हीं कर्मों से हमारा हिसाब -- किताब
लिखा जाता है , कब तक रहना है इस धरा पर
क्या करना है क्या नहीं सब पहले से तय है
हा , हमारे कर्म हमे जरूर कुछ हक जरूर
दिला देते है बस यही कारण है कि कुछ
कठपुतलियों के नाम स्वर्ण अक्षरों में
अंकित हो जाते हैं !!