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हम सब तो कठपुतलियां हैं

                
                                                         
                            हम सब तो कठपुतलियां हैं
                                                                 
                            
हमारी डोर तो हमारे रचनाकार
अर्थात विधाता के हाथों में है
अच्छे कर्म करने की छूट दी गई है हमें
हमारे इन्हीं कर्मों से हमारा हिसाब -- किताब
लिखा जाता है , कब तक रहना है इस धरा पर
क्या करना है क्या नहीं सब पहले से तय है
हा , हमारे कर्म हमे जरूर कुछ हक जरूर
दिला देते है बस यही कारण है कि कुछ
कठपुतलियों के नाम स्वर्ण अक्षरों में
अंकित हो जाते हैं !!
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7 महीने पहले

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