जन्म हुआ जब से मेरा ,चाह था की संसार घूमे
पहले दिन संसार का, कष्टो का पहाड़ गिरा
डॉक्टर साहब के पास में ,खेल के दिन निकल गए
घूमते हुए अस्पतालों में, स्नेह सारे नहीं मिले
बचपन की शुरुआत हुई तो ,खेल कूद सब भूल गया
माँ पापा कहते थे कि ,बेटा मेरा कब स्वास्थ्य होगा
दिन आया फिर मैं प्यारा हुआ ,खेल से नही मित्रता बढ़ा
गलियो में मै घूमता रहा ,मित्रों से न कभी मिला
फिर न वापस उस दिन में आया ,मित्रों से मै बिछड़ गया
वीराह के दिन आया गये ,विद्यालय का दिन जब शुरु हुआ
पुस्तकों में मै समा गया ,जब पढ़ाई से मैंने दोस्ती किया
पता नहीं था मुझे की कब ,पुस्तकों से मै लिपटा रहा
नही पता यह मुझे चला ,हो गया मैं इतना बड़ा
बाल शाखा सारे चले गये ,मै अभी तक यही पड़ा
पाठशाला के दिन बीत गए , फिर भी पढ़ाई में खोया रहा
ज्ञान के लिए दुनियाभर कि, घर को मैं त्याग चला
बहुत सारी उलझनों का फिर से, मेरे ऊपर जाल पड़ा
पढ़ाई का जब जोश चढ़ा, नई शिक्षा प्रणाली आई
पढ़ाई जैसे ही प्रारंभ हुआ ,केंद्रीय बोर्ड ने पैटर्न बदल दिया
फिर नई कार्य निर्देशिका , नया एक विस्तार किया
किताबों के झंझट ने, बाजार को बेहाल किया
लेखक की एक गलत बात ने, न्यायालय को संकट में किया
सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर फिर ,पुस्तकों को ही बदल दिया
शिक्षा विभाग ने र1 र2 और र3 का, फिर से नया रास्ता खड़ा किया
जीवन के इस माया जाल ने , हमको इस में फंसा लिया
न जाने कुदरत ने मेरे साथ ही , ऐसा करिश्मा क्यों किया
-अमित कुमार