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इश्क़ का हिसाब

Amit Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            इश्क़ का हिसाब
        
                                                    
                            

नक़द ही चुकाया उसने,
इश्क़ का सारा दर्द,
उधार में मोहब्बत करने का
उसका कोई हुनर ही नहीं था।

क़िस्तों में टूटना उसे
गवारा नहीं था,
दिल तो दे सकता था वो,
मगर सौदागरी का इरादा नहीं था।

हर ज़ख़्म की क़ीमत उसने
ख़ामोशी से चुकाई,
न किसी से उधार लिया सुकून,
न किसी से राहत पाई।

इश्क़ में लुटा तो इस क़दर,
कि ख़ुद को भी भूल गया,
मगर दिल का ये उसूल
आख़िरी साँस तक नहीं बदला

"मोहब्बत अगर करनी है,
तो पूरे दिल से करना,
यहाँ उधार के जज़्बातों से
किसी का दिल नहीं जीता जाता।"
-आचार्य अमित
3 घंटे पहले
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