इश्क़ का हिसाब
नक़द ही चुकाया उसने,
इश्क़ का सारा दर्द,
उधार में मोहब्बत करने का
उसका कोई हुनर ही नहीं था।
क़िस्तों में टूटना उसे
गवारा नहीं था,
दिल तो दे सकता था वो,
मगर सौदागरी का इरादा नहीं था।
हर ज़ख़्म की क़ीमत उसने
ख़ामोशी से चुकाई,
न किसी से उधार लिया सुकून,
न किसी से राहत पाई।
इश्क़ में लुटा तो इस क़दर,
कि ख़ुद को भी भूल गया,
मगर दिल का ये उसूल
आख़िरी साँस तक नहीं बदला
"मोहब्बत अगर करनी है,
तो पूरे दिल से करना,
यहाँ उधार के जज़्बातों से
किसी का दिल नहीं जीता जाता।"
-आचार्य अमित
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