"दिल अब दिल कहाँ रहा है…"
दिल अब दिल कहाँ रहा है,
एक मुसाफ़िरख़ाना बन बैठा है…
जहाँ कभी ख़ामोशियाँ ठहरा करती थीं,
वहाँ अब तेरी यादों का
एक पूरा कारवाँ आ बसा है।
तेरी यादों ने आकर इसमें,
अपनी सुगबुगाहट से फिर से,
एक ऐसा बसेरा कर लिया है…
कि अब इस दिल के हर कोने में,
तेरा ही नाम गूँजता है,
तेरा ही एहसास ठहरता है।
सुना है, जो लोग तन्हा रहते हैं,
वो अक्सर मस्त-मलंग होते हैं…
न दुनिया की फ़िक्र, न ज़माने का डर,
वो अपनी ही धुन में कहीं खोते हैं।
मगर इस फ़क़ीरी का राज़ हमने भी तब जाना,
जब तेरी गुमशुदगी में हमने,
ख़ुद को ही ख़ुद से जुदा पाया…
तुझे ढूँढ़ते-ढूँढ़ते इस क़दर खो गए,
कि फिर ख़ुद तक लौटने का रास्ता ही न पाया।
महीनों नहीं,
हमने तो पहर-पहर तेरी याद में गुज़ारे हैं…
कभी आँखों ने रात से बातें कीं,
कभी आँसुओं ने तेरे नाम के
कुछ ख़ामोश ख़त उतारे हैं।
और हैरत देखिए इस इश्क़ की,
न किसी ने कुछ पूछा,
न किसी ने कुछ कहा…
हम भीतर ही भीतर बिखरते रहे,
और ज़माने को ख़बर तक न हुई
कि हमारे साथ क्या-क्या हुआ।
अब ख़ुद को समेटना भी
कुछ नामुमकिन-सा लगता है,
क्योंकि जो कभी हमारा था,
वो अब हमारा कहाँ लगता है…
हम अब अपने में कहाँ हैं,
हमारी हस्ती में अब हमारा पता कहाँ है…
हमने ख़ुद को तेरी यादों के नाम कर दिया,
अब इस दिल में हमारे लिए
कोई दूसरा मकाँ कहाँ है?
अब न तन्हाई से शिकायत है,
न किसी महफ़िल की आरज़ू है…
तेरी यादों में जो सुकून मिला,
वही मेरी इबादत, वही मेरी जुस्तजू है।
हमने इश्क़ में ख़ुद को खोकर
एक नई ज़िंदगी का अर्थ जाना है…
हर बिछड़ना सिर्फ़ बिछड़ना नहीं होता,
कभी-कभी ख़ुद से मिलने के लिए भी
किसी का खो जाना ज़रूरी होता है।
अब हम अपने होकर भी अपने नहीं,
अब हम तेरे होकर ही रहते हैं…
लोग इसे इश्क़ कहें, जुनून कहें या फ़क़ीरी,
हम तो बस तेरी यादों के साए में
अपनी पूरी दुनिया जीते हैं।
क्योंकि कुछ मोहब्बतें
मुकम्मल होकर भी
अधूरी रहती हैं,
और कुछ अधूरी रहकर भी
इंसान को भीतर से मुकम्मल कर जाती हैं…
-आचार्य अमित