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आपसे मिलकर खिल गए हैं।

Amit Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जबसे मिले हैं आपसे,
        
                                                    
                            
लब जैसे सिल गए हैं,
परत-दर-परत जो वीरान थे हम,
आपसे मिलकर खिल गए हैं।

जो लोग संग समझते थे
कभी मेरे दिल की तन्हाई,
वो लोग अब जाने क्यों
इस दिल से ही निकल गए हैं।

धड़कनें जो आपकी
इस दिल में धड़कती हैं,
शायद बारिश की वो बूंदें हैं,
जो अर्श से उतरती हैं।

इन बूंदों की ख़ातिर
हम बिन बरसात भी
कुछ भीग से गए हैं,
कुछ अपने भीतर
कुछ और जी गए हैं।

आईं तमाम तन्हा रातें,
मगर कोई सोज़-सा रहता था,
ख़ामोशियों के उस पार
कोई आपसे कहता था।

ऐसी कितनी बातें हैं
जो मेरी आँखों ने
तेरी आँखों से कही हैं,
लब हिले भी नहीं
और न जाने
कितनी सदियाँ बातें हुई हैं।

कुछ दर्द थे जो कह न सके,
कुछ ख़्वाब थे जो सो न सके,
कुछ पल थे जो ठहर गए,
कुछ आँसू थे जो रो न सके।

अब तुमसे क्या कहूँ मैं, अमित,
इस दिल की दास्ताँ क्या लिखूँ—
उन सितारों की महफ़िल में
बस एक चाँद वही है...

जिसे देखकर रात सँवरती है,
जिसकी रोशनी में
हर तन्हाई निखरती है,
जिसके होने से
अधूरी-सी ज़िंदगी
मुकम्मल-सी लगती है...

उन अनगिनत सितारों के बीच
बस एक चाँद वही है,
मेरी हर दुआ का मतलब,
मेरी हर ख़ामोशी की आवाज़—
बस एक चाँद वही है...
बस एक चाँद वही है...
-आचार्य अमित
एक महीने पहले
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