चिकनी थी, कोमल थी, आकर्षक और सुलभ थी वो
बाजार से उठकर सभी के घरों में घुस गई थी वो
उसके आकर्षण ने सबको ऐसा लुभाया था
कब वह जरूरत बन गई कोई जान नहीं पाया था
फिर वह धीरे धीरे सांसों में जहर घोलने लगी
फैला के प्रदूषण जिंदगी पर कहर बनने लगी
मन तो नहीं करता था, उससे हो जाएँ अब भी जुदा
वक्त की जरूरत है,अतः, अलविदा पॉलीथीन अलविदा.
- श्रीकृष्ण शुक्ल, मुरादाबाद
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