ग़ज़ल
अब उससे रोज-रोज बात नहीं होती ,
मिलने को कहती है पर मुलाकात नहीं होती ,
सियासत बिना मज़हब के खास नहीं होती,
अब वसुधैव कुटुंबकम जैसी कोई बात नहीं होती,
साकी के लिए हर मयखाना परेशान लगता है
पर चकोर की चांदनी से मुलाकात नहीं होती ,
शराब के नशे में नशेमन मत गिराओ,
ये अलामत सी जिंदगी बार-बार नहीं होती,
इस हिन्दोस्तां को गुलिस्ता की तरह पाला गया है ,
इसके अपमान की कीमत अब आसान नहीं होती ,
जिंदगी हौसलों की तुरपाई सी लगती है,
मुसीबत तो जिंदगी में शिवाय मेहमान नहीं होती,
आज भीगा सा मौसम बड़ा हसीन लगा तुम्हे ,
पर चंद बूंदें गिरने से बरसात नहीं होती,
कमर तोड़ दी है इन अब्रों ने किसानों की ,
शहरियों के लिए शिमला से कम कोई बरसात नही होती
वक्त की बर्बादी का खामियाजा तो तुम भुगतोगे,
वक्त के बीत जाने पर कोई आवाज नहीं होती,
हमारी जिंदगी तो फलसफों में उलझी सी लगती है ,
इम्तिहान रोज देती है पर पास नहीं होती,
हमें तो लगता है रसूख है बुनियाद इसकी,
पर अदावत के बिना कोई वारदात नहीं होती,
आलोक रोज बस उसी के बारे में सोचता है,
पर ख्वाबों के सिवा उससे कभी बात नहीं होती,
मिलती तो रोज है वो पर मुलाक़ात नही होती,
अब उससे रोज-रोज बात नही होती…।।।।
अलामत-धरोहर
रसूख़- प्रभाव
साकी- शराब पिलाने वाला
चकोर-पक्षी
अदावत-रंजिश
फ़लसफा- ज्ञान
नशेमन- घोंसला/आशियाना
अब्र- बादल
Alok Yadav (sitapur diet)
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