दूर तक लगी हुई लंबी कतार है
ख्वाहिशों का जिंदगी अजब बाजार है
ग़म में दोस्ती निभाने कोई आया ही नहीं
खुशी में दोस्ती का हर एक तलबगार है
खोज लेना खुद में मिल ही जायेगा एक दिन
यहाँ सुकून के लिये जो बेक़रार है
हो गई हो अगर आपस में दुश्मनी
फांद लेना बीच की जो भी दीवार है
कहने सुनने को यहाँ फिर कुछ नहीं रहता
वक़्त की जब भी पड़ी गहरी सी मार है
समंदर में समा जाने को वो ठान के बैठी
जिंदगी है ये या नदिया की धार है
मेहनत कशों के तन से पसीना जो चू रहा
कहते हैं लोग उनका ये सच्चा सिंगार है
रहते यहाँ कब किसी के होश ठिकाने
चढ़ा है जिस किसी पे इश्क का बुखार है
आदमी वही है जो कि हार ना माने
मुश्किलों ने हौसलों से मानी हार है
ओढ़ ली है ओढ़नी मुस्कान की उसने
हर फूल के लिये जरूरी एक खार है
फकीर कह रहा था यह सभी के सामने
रस सारे संसार का आलोक प्यार है
-आलोक