विज्ञापन

चढ़ा है जिस किसी पे इश्क का बुखार है

Alok Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            दूर तक लगी हुई लंबी कतार है
        
                                                    
                            
ख्वाहिशों का जिंदगी अजब बाजार है

ग़म में दोस्ती निभाने कोई आया ही नहीं
खुशी में दोस्ती का हर एक तलबगार है

खोज लेना खुद में मिल ही जायेगा एक दिन
यहाँ सुकून के लिये जो बेक़रार है

हो गई हो अगर आपस में दुश्मनी
फांद लेना बीच की जो भी दीवार है

कहने सुनने को यहाँ फिर कुछ नहीं रहता
वक़्त की जब भी पड़ी गहरी सी मार है

समंदर में समा जाने को वो ठान के बैठी
जिंदगी है ये या नदिया की धार है

मेहनत कशों के तन से पसीना जो चू रहा
कहते हैं लोग उनका ये सच्चा सिंगार है

रहते यहाँ कब किसी के होश ठिकाने
चढ़ा है जिस किसी पे इश्क का बुखार है

आदमी वही है जो कि हार ना माने
मुश्किलों ने हौसलों से मानी हार है

ओढ़ ली है ओढ़नी मुस्कान की उसने
हर फूल के लिये जरूरी एक खार है

फकीर कह रहा था यह सभी के सामने
रस सारे संसार का आलोक प्यार है
-आलोक
23 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Dn Chaubey

7573 कविताएं

View Profile