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आलोक तो हर रोज ही पलकों की कोर से

Alok Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कह रहा है कोई हाये क्या ये कान में
        
                                                    
                            
रखिये घोल कर शहद अजी जुबान में

मेल मुलाकात तो खुद से भी कीजिये
यूँही भटकना भी क्या दुनियाँ जहान में

दिल को लग गई ये बात लाख टके की
ईश्वर की बसर ही तो है हर मुस्कान में

आसमाँ निहारते फूलों को देखिये
कसीदे पढ़ रहे हों सब रब की शान में

एक बात माननी तो होगी सभी को
जो लिखा है गीता में वही कुरान में

बचपन का कोई दोस्त काश कहीं आ मिले
याद ताजा दम हों चाय की दुकान में

आलोक तो हर रोज ही पलकों की कोर से
टांकते हैं अंजुमों को आसमान में
-आलोक
21 मिनट पहले
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