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माँ की यादें और बरसातें

Alka Gupta

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            इन बारिशों में बरस जाती हैं,
        
                                                    
                            
न जाने कितनी ही बरसातें
कहीं खिले गुल, कहीं दे जाती
अंतहीन पीड़ा ये जाते-जाते

ऐसे में याद आती है माँ बहुत
तुम्हारा आँचल वो प्यारी सौगातें
कागज़ की नाव, कपड़े की गुड़िया
और तुम्हारी प्यारी-प्यारी बातें

रुठे हुए पल, वो छूटे हुए कल
फिर वापस क्यों नहीं आते?
मासूम बचपन, वो अपनापन
रुला जाते हैं ये मेघा जाते-जाते

हो मन रीता या कोई खालीपन
फिर हों लाख मेले, रास नहीं आते
और अक्सर यूं ही बरसती रहती हैं
मेरे मन के भीतर ये बरसातें

याद है छत पर बूंदों की टप-टप
और वो खट-खट करते दरवाजे
लुटने पर मेरे, मेरी लाड़ली बिट्टो
दुलार भरी वो तेरी आवाज़ें

अब ना तो माँ है ना आवाजें
ना वो छत, ना मौसम ना दरवाजे
फिर क्यों चली आती हैं मेरे घर
बरसने ये बेमौसम की बरसातें
एक वर्ष पहले
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