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हेमंत ऋतु...

AL Mishra

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आई सर्दी, आई सर्दी
        
                                                    
                            
नहीं किसी से हमदर्दी
उसके तीखे तेवर से,
घबराते सब नर-नारी।
अग्नि के शरण गये
जटा-जूट धारी।
कोहरा ,पाला उसके मीत,
भानु हुआ उससे भयभीत।
खोई चमक भानु ने अपनी,
घर -घर जलती है अग्नि।
कोहरे के हमले से ,
भानु बहुत घबड़ाया।
किसी कोने में जाकर ,
अपना मुँह छिपाया।
बूढ़ों के हैं हाड़ काँपते,
बच्चे उछलें दे तारी।
सर में दौड़ें हंस , सवन,
बतखें मारी किलकारी।
हीटर ,ब्लोवर मंहगे ,
चाय की मारा मारी।
आई सर्दी ,आई सर्दी ,
नहीं किसी से हमदर्दी

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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7 वर्ष पहले
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