आई सर्दी, आई सर्दी
नहीं किसी से हमदर्दी
उसके तीखे तेवर से,
घबराते सब नर-नारी।
अग्नि के शरण गये
जटा-जूट धारी।
कोहरा ,पाला उसके मीत,
भानु हुआ उससे भयभीत।
खोई चमक भानु ने अपनी,
घर -घर जलती है अग्नि।
कोहरे के हमले से ,
भानु बहुत घबड़ाया।
किसी कोने में जाकर ,
अपना मुँह छिपाया।
बूढ़ों के हैं हाड़ काँपते,
बच्चे उछलें दे तारी।
सर में दौड़ें हंस , सवन,
बतखें मारी किलकारी।
हीटर ,ब्लोवर मंहगे ,
चाय की मारा मारी।
आई सर्दी ,आई सर्दी ,
नहीं किसी से हमदर्दी
हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
कमेंट
कमेंट X