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उसी निर्जन स्थान पर वीर मिलते हैं

Akshika BHARDWAJ

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सत्यपथ को सदैव निष्ठा से हेरा
        
                                                    
                            
कर्तव्य विमुख हो ध्यान नहीं फेरा
राह कंटक हो मगर राह नहीं छोड़ी
कभी मित्र जन की बाह नहीं छोड़ी

जगत जीतने की आस चरणों में
सारा धन वैभव विलास चरणो में
शौर्या गाथा का वही है अनूप पात्र
चरित्र सममुख सूर्य भी है दीप मात्र

उन्हें भूमि की जटिलताएं पालती है
उन ही के बल धरा निष्ठा बंधती है
जिस ऊसर में कुसुम नहीं खिलते हैं
उसी निर्जन स्थान पर वीर मिलते हैं
एक घंटा पहले
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