सत्यपथ को सदैव निष्ठा से हेरा
कर्तव्य विमुख हो ध्यान नहीं फेरा
राह कंटक हो मगर राह नहीं छोड़ी
कभी मित्र जन की बाह नहीं छोड़ी
जगत जीतने की आस चरणों में
सारा धन वैभव विलास चरणो में
शौर्या गाथा का वही है अनूप पात्र
चरित्र सममुख सूर्य भी है दीप मात्र
उन्हें भूमि की जटिलताएं पालती है
उन ही के बल धरा निष्ठा बंधती है
जिस ऊसर में कुसुम नहीं खिलते हैं
उसी निर्जन स्थान पर वीर मिलते हैं
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