मैं तो हूं नन्हीं सी पंछी, बाबुल तेरे आंगन की।
ना भेज मुझे परदेस बाबुल, मैं तो हूं इस आंगन की।
तेरे ही उपकार पर जीती, तेरे ही सम्मान पर जीती।
ना प्रित मुझे संसार की बाबुल,ना चाह मुझे धनवार की।
तेरे इस सम्मान की खातिर, जाती हूं मैं पराए आंगन।
जहां कदर ना हो मेरी होती, ना होता दुलार तुम्हारा।
कहां तुम्हारे बगिया के सुमन थी, कहां यहां की दासी हूं।
मैं तो हूं नन्हीं सी पंछी बाबुल तेरे आंगन की।।
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