विज्ञापन

नन्हीं पक्षी

Akhilesh yadav

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मैं तो हूं नन्हीं सी पंछी, बाबुल तेरे आंगन की।
        
                                                    
                            
ना भेज मुझे परदेस बाबुल, मैं तो हूं इस आंगन की।
तेरे ही उपकार पर जीती, तेरे ही सम्मान पर जीती।
ना प्रित मुझे संसार की बाबुल,ना चाह मुझे धनवार की।
तेरे इस सम्मान की खातिर, जाती हूं मैं पराए आंगन।
जहां कदर ना हो मेरी होती, ना होता दुलार तुम्हारा।
कहां तुम्हारे बगिया के सुमन थी, कहां यहां की दासी हूं।
मैं तो हूं नन्हीं सी पंछी बाबुल तेरे आंगन की।।



हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।  
6 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all