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अर्द्धांगिनी के अहंकार की वेदी पर

Akhilesh Joshi 'Anpadh'

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            देखता हूँ वह दंभ जलनिधि-सा,
        
                                                    
                            
नभ को छूने का इतराना,
स्वयं कमाकर भी प्रियतम को,
पल-पल पददलित कर जाना।

मुँह सीए, झेलता चुपचाप ही
अभिशाप-ताप की ज्वालाएँ,
देखी उस अर्थ-गर्व की
चिर मौन प्रताड़ना-मालाएँ!

समकक्ष आय जब दोनों की,
फिर भी न कोई श्यामल आशा,
स्वयं की पूँजी पर गर्वित
निज मुख से तीखी उपहास-भाषा।

अनुभव का था अंबर सिर पर,
पर सीखना मंजूर नहीं था,
अहंकार की उस चौखट पर,
मेरा हर इक सुर बेनूर हुआ।

बच्चे भी निकले जब सपूत,
चमक उठा कुल का मस्तक,
पर इस घर के काले साये में,
तानों का क्रम न हुआ स्तब्ध!

बुढ़ापे की इस दहलीज पर आकर,
नवपीढ़ी संग चलना है दुर्भर,
कदम-कदम पर ठोकर खाकर,
घुट-घुट कर कटता है हर पहर।

उसी घुटन में चुपके-चुपके,
विषाद ने पाँव पसारे हैं,
अवसाद की उस काली छाया ने
मेरे सारे प्राण सँवारे हैं!

फिर उन हताश नयनों की,
जिनके अब आँसू सूखे हैं,
उस मौन प्रलय की पीड़ा में,
जो स्नेह-रहित भूखे हैं।

धन-धान्य भरी थी अपनी तिजोरी,
फिर भी सूनी मन की कहानी,
कहाँ खोई वह प्रीति-प्रतीक्षा,
हे मेरी हठीली अर्द्धांगिनी!

सूने घर के कोने में,
निशि-वासर जलते-जाते जाना,
उस क्षीण स्नेह के दीपक का
यूँ चुपके-चुपके बुझ जाना!

जब अंत समय की साँसों में,
कोई ना दूजा सहारा बचा था,
इस सूखी, निर्दय दुनिया में,
बस पति की छाती को भिगोना था!

समस्त श्रम का निचोड़ ले,
इस सूखे-निर्दय जीवन में,
बरसे हो पाषाण-दृष्टि-सा,
आँसू इस गृह-सदन में।

— अखिलेश जोशी ‘अनपढ़’

 
एक घंटा पहले
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