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दधीमथो का प्रलय-जयी पौरुष के अमर्ष और आह्वान

Akhil Dadhich

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            नियति के अकाट्य क्रम पर यदि ये सितारे चलते हैं, तो चलें—
        
                                                    
                            
हमारे वक्ष का यह प्रदीप्त पौरुष किसी नक्षत्र का मोहताज नहीं!

प्रलय-जयी पौरुष के अमर्ष और आह्वान नियति के अकाट्य क्रम पर यदि ये सितारे चलते हैं, तो चलें—
हमारे वक्ष का यह प्रदीप्त पौरुष किसी नक्षत्र का मोहताज नहीं!

यह देह कोई साधारण नश्वर कलेवर नहीं है—
इसमें पुरखों की तपिश और तेवर धधकते हैं,
जो सिखाते हैं हमें इन वातचक्र में भी झुकना नहीं,
और आत्मसम्मान की आन पर कभी डिगना नहीं!

हमारे नयनों में धधकता यह क्रोधाग्नि का प्रज्वलित अंगार
तम के हर प्रगाढ़ अंचल को भस्म कर डालता है।
हम वो नहीं जो भय के पाश में बँधकर अपनी ग्रीवा झुका लें,
गर्दिश का विलाप तो कायरों की देहरी का मूक संगीत है;
हमारा तो प्रत्येक निःश्वास एक महाप्रलयी झंझावात है
जो अपनी ही हुंकार से दसों दिशाओं का भूगोल बदल देता है!

माना तिमिर ने निगल लिया है श्यामल नभ मंडल,
और भास्कर का रथ कुछ पल को मौन-मग्न है—
किंतु उस राहु की क्या बिसात हमारे तीक्ष्ण तेज के सम्मुख,
जब हमारी अपनी चेतना में मार्तंड प्रखर हो!
जो नभ-मंडल से टूटकर धूल में विलीन हो जाए, वह नक्षत्र-खंड?
सच्चा योद्धा तो वही है...
जो कुल की मर्यादा और अपने स्वाभिमान की आन पर
तूफानों के महासमुद्र के बीच भी अपनी अडिग पहचान गढ़े।

उठो, अपने तीक्ष्ण तेज के संग—
ललाट पर इस काल-रात्रि का रक्त-तिलक सजाओ।प्रतिकूलता के इस महाप्रलयी भुजंग को,
अपने बाहु-पाश के वज्र से जकड़ लो!
हर धुंध को चीर डालो, हर अवरुद्ध प्रस्तर को तोड़ डालो,
अपने प्रखर पुरुषार्थ से नव सूर्य का आह्वान करो!
संस्कारों और चेतना के अनंत प्रकाश से रच दो नया इतिहास—
जहाँ ब्रह्मांड की हर गर्दिश भी विवश होकर
तुम्हारे अजेय संकल्प के चरणों में नतमस्तक हो जाए!
एक घंटा पहले
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