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मेरी भावना को लफ्ज़ समझते हैं

Ajit Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मैं लिखता हूं अपनी भावनाओं को
        
                                                    
                            
वो इसे सिर्फ लफ्ज समझते हैं
बनते हैं बहुत नादान
मेरी भावनाओं को खूब कुरेदते हैं 
निगाहों से बात, जुबां ख़ामोश है
मेरे वो इशारे को खूब समझते हैं !
मेरी भावना की कद्र ही नहीं उनको
कहाँ फायदा है ये खूब समझते हैं!
अक्सर ख़ामोश रहना मेरी आदत है,
दिलों की गुफ़्तगू कुछ लोग समझते है!

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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