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न्याय न्याय ही न रहा, ये हो गया बाज़ारू है

Ajit Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हक़ से हक़ दिया तुमको, तुम वज़ीर बन बैठे,
        
                                                    
                            
हक़ तो ना मिला हमको, हम हकीर बन बैठे।

दर-ब-दर भटकते हैं, दफ्तरों के जंगल में,
चंद सिक्के खातिर, सब बेज़मीर बन बैठे।

दिल में ना मोहब्बत है, ऑंखों में बेहयायी है,
सारे दुष्कर्मों का, तुम नज़ीर बन बैठे।

बेरहम जमाने से, रहम की आस मत करना,
साख जिनको जितनी है, वे तो मीर बन बैठे।

न्याय न्याय ही न रहा, ये हो गया बाज़ारू है,
जिनके पास पैसे हैं, वे खरीदार बन बैठे।

सत्य तो सिसकता है, असत्य की पनाहों में,
रहनुमा ही कानून के, आज शमशीर बन बैठे।
-अजीत कुमार
 
23 घंटे पहले
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