आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

न्याय न्याय ही न रहा, ये हो गया बाज़ारू है

                
                                                         
                            हक़ से हक़ दिया तुमको, तुम वज़ीर बन बैठे,
                                                                 
                            
हक़ तो ना मिला हमको, हम हकीर बन बैठे।

दर-ब-दर भटकते हैं, दफ्तरों के जंगल में,
चंद सिक्के खातिर, सब बेज़मीर बन बैठे।

दिल में ना मोहब्बत है, ऑंखों में बेहयायी है,
सारे दुष्कर्मों का, तुम नज़ीर बन बैठे।

बेरहम जमाने से, रहम की आस मत करना,
साख जिनको जितनी है, वे तो मीर बन बैठे।

न्याय न्याय ही न रहा, ये हो गया बाज़ारू है,
जिनके पास पैसे हैं, वे खरीदार बन बैठे।

सत्य तो सिसकता है, असत्य की पनाहों में,
रहनुमा ही कानून के, आज शमशीर बन बैठे।
-अजीत कुमार
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
23 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर