तेरी आंखें इतनी
ख़ूबसूरत है
जब तू मुझे देखती है
कोई रिश्ता क़ायम
सा हो जाता है
तेरा सरापा का असर
मुझपर कुछ इस क़दर है
कि मेरे लफ़्ज़ों में तू
उतर सी जाती है
जब तू कभी मुझे अपनी घनी
ज़ुल्फ़ों से ढंकती है
मेरी नज़रों के सामने नीला
अनन्त अासमान सा उतर जाता है
फिर हम दोनों नादान, अंजान
परिन्दे सा उन्मुक्त परवाज़ करते हैं
जब सूरज थक कर
आंखों से ओझल हो जाता है
और सुरमयी शाम तेरे काजल
सा ज़मीं को घेर लेती है
मै तेरी आंखों से होकर
दिल में उतर जाता हूँ
तू आंखे बंद कर लेती है
मै सो जाता हूँ ख़्वाबों सा
और जब तेरी आंखे खुलती है
सूरज की नई किरण दस्तक दे
चुकी होती है उम्मीदों की तरह
फिर मै "अजीत " तेरे दिल से
होकर आंखों में उभरता हूँ
नये अंकुरित पौधे की तरह.......
अजीत यादव
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