आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

तुम

                
                                                         
                            तेरी आंखें इतनी
                                                                 
                            
ख़ूबसूरत है
जब तू मुझे देखती है
कोई रिश्ता क़ायम
सा हो जाता है
तेरा सरापा का असर
मुझपर कुछ इस क़दर है
कि मेरे लफ़्ज़ों में तू
उतर सी जाती है
जब तू कभी मुझे अपनी घनी
ज़ुल्फ़ों से ढंकती है
मेरी नज़रों के सामने नीला
अनन्त अासमान सा उतर जाता है
फिर हम दोनों नादान, अंजान
परिन्दे सा उन्मुक्त परवाज़ करते हैं
जब सूरज थक कर
आंखों से ओझल हो जाता है
और सुरमयी शाम तेरे काजल
सा ज़मीं को घेर लेती है
मै तेरी आंखों से होकर
दिल में उतर जाता हूँ
तू आंखे बंद कर लेती है
मै सो जाता हूँ ख़्वाबों सा
और जब तेरी आंखे खुलती है
सूरज की नई किरण दस्तक दे
चुकी होती है उम्मीदों की तरह
फिर मै "अजीत " तेरे दिल से
होकर आंखों में उभरता हूँ
नये अंकुरित पौधे की तरह.......

अजीत यादव

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
7 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर