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ग़ज़ल

Ajeet Yadav

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            चल चलें हम कहीं उम्र भर के लिए
        
                                                    
                            
ये ज़मी आसमां है बसर के लिए

इस ज़माने से कुछ भी नहीं चाहिये
मुझको तू चाहिये इस नज़र के लिए

तेरी ज़ुल्फ़ों तले मेरी हर शाम हो
सामने हो तेरा रूख़ सहर के लिए

इक तेरा साथ हो बस ख़ुदा की क़सम
मुझको क्या चाहिये और सफ़र के लिए

अजीत क्या करेंगे रहकर मुर्दों के शहर में
बशर बन गया है दुश्मन बशर के लिए

अजीत यादव

बसर.... निर्वाह करना
रूख़... चेहरा
सहर... सुबह
बशर... आदमी



- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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