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बुत

Ajeet Yadav

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            असंख्य अरमानों
        
                                                    
                            
की पोटली को
क़ैद करके बैठ जाना
अपने अंत:करण में...
क्या करता?
बिखरने से बचाना भी
तो हमें इसी सभ्य समाज
ने सिखाया है...
मूल्यहीन संवेदना का
दंश झेलने से अच्छा है
पनपने दो अपने
अंत:करण में....
तैयार होने दो
एक विशालकाय पेड़
जो स्वत:तोड़ कर निकल जाये
अंत:करण की दीवारों को....
और आभास करा दे
अपनी शक्ति का...
यही सिद्धांत बचा है वर्तमान में
मानव दर्शन और दृष्टिकोण का....
मृत्यु उस मूल्यहीन को
मूल्यवान बना देती है....
सजीव के प्रति इतनी
निर्ममता और कठोरता
फिर उसी की याद में बना
निर्जीव बुत के सजदे में
झुकता सिर,
झूठी सहानुभूति के आँसू
सांकेतिक है
उसकी आत्मा के अमर होने
का जो कभी सजीव था.....
"अजीत" जो एक विशालकाय
पेड़ से क्षतिग्रस्त होकर
मिट गया....

अजीत यादव

 हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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