असंख्य अरमानों
की पोटली को
क़ैद करके बैठ जाना
अपने अंत:करण में...
क्या करता?
बिखरने से बचाना भी
तो हमें इसी सभ्य समाज
ने सिखाया है...
मूल्यहीन संवेदना का
दंश झेलने से अच्छा है
पनपने दो अपने
अंत:करण में....
तैयार होने दो
एक विशालकाय पेड़
जो स्वत:तोड़ कर निकल जाये
अंत:करण की दीवारों को....
और आभास करा दे
अपनी शक्ति का...
यही सिद्धांत बचा है वर्तमान में
मानव दर्शन और दृष्टिकोण का....
मृत्यु उस मूल्यहीन को
मूल्यवान बना देती है....
सजीव के प्रति इतनी
निर्ममता और कठोरता
फिर उसी की याद में बना
निर्जीव बुत के सजदे में
झुकता सिर,
झूठी सहानुभूति के आँसू
सांकेतिक है
उसकी आत्मा के अमर होने
का जो कभी सजीव था.....
"अजीत" जो एक विशालकाय
पेड़ से क्षतिग्रस्त होकर
मिट गया....
अजीत यादव
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