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तुझसे दूर कैसे जाऊँ

अजय कुमार

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कई बार सोचा है मैंने,
        
                                                    
                            
कि तुमसे रूठ जाऊँ,
ख़फ़ा होकर तुमसे
बहुत दूर चला जाऊँ।

पर हर बार मेरी यह कोशिश
नाकाम हो जाती है,
तुमसे रूठना तो दूर,
तुमसे एक पल की दूरी भी
मुझसे सहन नहीं हो पाती है।

तुम्हें अपनी निगाहों से
एक पल के लिए भी
दूर कैसे कर पाऊँ?

तुम्हें छोड़कर आखिर
मैं कहाँ चला जाऊँ?

तुमसे ख़फ़ा होकर
मैं कैसे जी पाऊँगा?

जब तक साँसें चल रही हैं
तुम्हें अपने दिल से
कैसे निकाल पाऊँगा?

तुम मेरी यादों में हो,
मेरी धड़कनों में हो,
तुम्हें भूलना चाहूँ भी तो
कैसे भूल पाऊँ?

यह कैसी चाहत है,
यह कैसी आदत है,
तुम्हारे दिल में मेरे लिए
बेइंतहा नफ़रत है,
और मेरे दिल में
तुम्हारे लिए बेपनाह मोहब्बत है।

तुम ही बता दो,
कोई ऐसी वजह, कोई ऐसा नुस्ख़ा,
जिससे मैं तुम्हें
हमेशा के लिए भूल पाऊँ।

तुमसे ख़फ़ा होकर
बहुत दूर चला जाऊँ,
तुम्हारी दुनिया से
हमेशा के लिए निकल जाऊँ।

मुझे पता है,
बहुत अच्छी तरह पता है—
तुम करती हो मुझसे
नफ़रत... बहुत नफ़रत।

लेकिन यह दिल भी क्या करे,
इसे तो तुमसे ही
मोहब्बत है।

तुममें ही खो जाने को
यह दिल बेताब है,
तुममें ही फ़ना हो जाने को
हर पल तैयार है।

अब इस दिल पर
मेरा कोई अधिकार नहीं,
यह मेरी सुनता ही नहीं।

अंजाम क्या होगा,
मुझे इसका ज़रा भी अंदाज़ा नहीं,
फिर भी यह इश्क़
रुकने का नाम नहीं लेता।

ऐ इश्क़, अब तू ही बता—
मैं कहाँ जाऊँ?

क्या तेरी यादों को लेकर
तेरे शहर से चला जाऊँ?

या फिर तेरी गलियों में
बदनाम होकर भी
तेरे करीब ही रह जाऊँ?

क्योंकि सच तो यह है—
तुझसे दूर जाना
मेरे लिए संभव नहीं,
और तुझे भूल जाना
मेरे लिए मुमकिन नहीं।
— अजयकुमार
एक महीने पहले
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