यहाँ हर कोई
अपने जिस्म को दिखाना चाहता है,
अपनों को पर्दे में रखकर
गैरों को बेपर्दा करना चाहता है।
चेहरों पर शराफ़त का नक़ाब है,
अंदर जाने कितने राज़ हैं,
जो दूसरों पर उँगली उठाते हैं,
उनके अपने हाथ भी दाग़दार हैं।
शरीफ़ों के इस मोहल्ले में
मैंने अजीब नज़ारे देखे हैं,
लाचारों को लुटते देखा,
और तमाशबीनों को शरीफ़ कहते देखा है।
आँखें थीं, फिर भी अंधे बने रहे,
सच सामने था, फिर भी चुप रहे,
ज़ुल्म होता रहा आँखों के सामने,
और लोग अपनी शराफ़त में छिपे रहे।
अपनी इज़्ज़त को बचाकर
दूसरों की इज़्ज़त से खेलते हैं,
अपने दामन को साफ़ रखकर
दूसरों के दामन पर कीचड़ फेंकते हैं।
यह कैसा समाज है,
जहाँ चरित्र से ज़्यादा चेहरा देखा जाता है?
जहाँ सच बोलने वाला बदनाम होता है,
और झूठ बोलने वाला शरीफ़ कहलाता है।
यहाँ दूसरों के अरमान कुचले जाते हैं,
जज़्बातों को पैरों तले रौंदा जाता है,
और फिर वही इंसान
अपने आपको नेक कहलाता है।
भरे शहर में दिन-दहाड़े
एक मजबूर को लुटते देखा है,
मदद के लिए उठे नहीं हाथ,
बस तमाशा देखते देखा है।
तब समझ आया—
पर्दा जिस्म पर नहीं,
नीयत पर पड़ा है;
चेहरा भले ही बेदाग़ हो,
अगर ज़मीर सोया है,
तो इंसान भीतर से बेपर्दा है।
यह शरीफ़ों का मोहल्ला है,
जहाँ चेहरों पर पर्दे बहुत हैं,
मगर ज़मीर के आईने में
हर कोई बेपर्दा खड़ा है।