विज्ञापन

दूर हो ये बेबसी

Ajay Singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            रह रह के उठती है सिहर, क्यूँ हवा ख़ामोश सी।
        
                                                    
                            
कभी है छा जाती नमी, तो आँधी कभी फिर रोष की।।

आदमी भटका हुआ है, ... आदमी के काम से।
सबको बस अपनी पड़ी , मतलब है अपने नाम से।।

हर तरफ़ बस उलझनें हैं, .. उलझनों में आप हैं।
सोचते .. किसको पुकारें, ... हर तरफ़ बस आप हैं।।

कंधा पकड़ कल संग चले जो, बेवफ़ाई कर गए।
मंज़िल पे ख़ुद अपनी पहुँच, दलदल में हमको कर गए।।

हल नहीं कोई भी मिलता, हौसला फिर भी अभी।
शायद नज़र आएँ सितारे..., आसमाँ पर फिर कभी।।

उम्मीद की अब तक है बाक़ी... एक ज्वाला धीमी सी।
राहे ख़ुशी हमको मिले ... फिर दूर हो ये बेबसी।।
एक घंटा पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Adv DK Kanojiya

71 कविताएं

View Profile

Suresh Kumar

579 कविताएं

View Profile