रह रह के उठती है सिहर, क्यूँ हवा ख़ामोश सी।
कभी है छा जाती नमी, तो आँधी कभी फिर रोष की।।
आदमी भटका हुआ है, ... आदमी के काम से।
सबको बस अपनी पड़ी , मतलब है अपने नाम से।।
हर तरफ़ बस उलझनें हैं, .. उलझनों में आप हैं।
सोचते .. किसको पुकारें, ... हर तरफ़ बस आप हैं।।
कंधा पकड़ कल संग चले जो, बेवफ़ाई कर गए।
मंज़िल पे ख़ुद अपनी पहुँच, दलदल में हमको कर गए।।
हल नहीं कोई भी मिलता, हौसला फिर भी अभी।
शायद नज़र आएँ सितारे..., आसमाँ पर फिर कभी।।
उम्मीद की अब तक है बाक़ी... एक ज्वाला धीमी सी।
राहे ख़ुशी हमको मिले ... फिर दूर हो ये बेबसी।।
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