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नारी के प्रति कृतज्ञता.

Ajay Shobhane

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मैं गुमान करूं कैसे , मुझे ठीक से नारी की पहचान हीं है ।
        
                                                    
                            

मेरा अंधकार है गहरा , मुझे अनुभूति का ज्ञान नहीं है ,
जो पीड़ा तुमने भोगी है , मुझे उसका अनुमान नहीं है !
पीड़ा से सृजन होता , तेरी पीड़ा का मुझे भान नहीं है ,
मैं ये बात बताऊँ कैसे , पर-पीड़ा का मुझे ज्ञान नहीं है !
मैं गुमान करूं कैसे , मुझे ठीक से नारी की पहचान नही है ।

भ्रूण हत्या क्यूँ करता , क्यों कि- मैंने पीड़ा नहीं भोगी है ,
मूर्ख हूं मैं, मुझे नहीं पता, संसार की रचना कैसे होती है !
संतुलन रखने हेतु , प्रकृति विधि का , मुझे ज्ञान नहीं है ,
तुझे मिटा के स्वयं मिटूंगा , मुझे इसका अनुमान नहीं है 

मैं गुमान करूं कैसे , मुझे ठीक से नारी की पहचान नहीं है ।
तुम चट्टान सी दिखती हो , पर अनुभव तुम्हारा गहरा है ,
जो चट्टान तोड़ के राह बनाती , तू जल की वह धारा है !
हरे तृण से भी अति-कोमल , करुणा भरा प्यार तुम्हारा है ,
शास्त्रों ने जिसे नरक कहा , इस असत्य का भान नहीं है !
मैं गुमान करूं कैसे , मुझे ठीक से नारी की पहचान नहीं है ।

– अजय शोभने.
2 घंटे पहले
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